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Friday, 19 June 2020

SHIVPURAN / शिवपुराण की कथा

                


         शिव पुराण हिंदू धर्म में संस्कृत ग्रंथों के अठारह प्रमुख पुराण शैली में से एक है, और शैव धर्म साहित्य कोष का हिस्सा है। यह मुख्य रूप से हिंदू भगवान शिव और देवी पार्वती के आसपास है, लेकिन सभी देवताओं को संदर्भित करता है और श्रद्धा करता है। 

 शिव पुराण में कहा गया है कि एक बार बारह संहिता (किताबों) में स्थापित 100,000 छंद शामिल थे।  यह सोता वर्ग से संबंधित व्यास के शिष्य, रोम्हारशासन द्वारा लिखा गया था।  जीवित पांडुलिपियां कई अलग-अलग संस्करणों और सामग्री में मौजूद हैं,  जिसमें सात पुस्तकों के साथ एक प्रमुख संस्करण (दक्षिण भारत का पता लगाया गया है), दूसरे में छह पुस्तकों के साथ, जबकि तीसरे संस्करण में भारतीय उपमहाद्वीप के मध्य बंगाल क्षेत्र में कोई किताब नहीं है।  लेकिन दो बड़े खंडों को पूर्वा-खंड (पिछला खंड) और उत्तरा-खंड (बाद का खंड) कहा जाता है।  दो संस्करणों में पुस्तकें शामिल हैं, कुछ पुस्तकों का शीर्षक समान और अन्य अलग-अलग हैं। शिव पुराण, हिंदू साहित्य में अन्य पुराणों की तरह, एक जीवित पाठ था, जो लंबे समय तक नियमित रूप से संपादित, पुन: व्यवस्थित और संशोधित किया गया था।  जीवित ग्रंथों की सबसे पुरानी पांडुलिपि संभावित रूप से रची गई थी, क्लॉस क्लोस्टमेराइयर का अनुमान है, लगभग 4 से 2 वीं शताब्दी ईसा पूर्व। ।  वर्तमान में जीवित शिव पुराण पांडुलिपियों के कुछ अध्यायों की रचना पहली शताब्दी सीई के बाद की गई थी। 

 शिव पुराण में ब्रह्माण्ड विज्ञान, पौराणिक कथाओं, देवताओं, नैतिकता, योग, तीर्थ (तीर्थ), भक्ति, नदियों और भूगोल, और अन्य विषयों के बीच संबंध हैं।  पाठ विभिन्न प्रकारों पर ऐतिहासिक जानकारी का एक महत्वपूर्ण स्रोत है और प्रारंभिक 1-सहस्राब्दी ईसा पूर्व में शैव धर्म के पीछे धर्मशास्त्र है। शिव पुराण के सबसे पुराने जीवित अध्यायों में महत्वपूर्ण अद्वैत वेदांत दर्शन है, जो भक्ति के आस्तिक तत्वों के साथ मिश्रित है। 

इस पाठ के कई पुनरावृत्ति मौजूद हैं।  वंगावसी प्रेस, कलकत्ता द्वारा 1896 में प्रकाशित बंबई 1884 पांडुलिपि में पांच सौहित (खंड) शामिल हैं: 

 # संहिता
 (खंड) Adhyāyas
 (अध्याय)
 इ विद्यावारा सौहित 16
 II कैलाश सौहित 12
 III सन्तकुमार सहिता 59
 इव वैवैया सौहित}}:
 मैं।  Pūrvabhāga
 ii।  Uttarabhāga
 30
 30
 वी धर्म संहिता 65
 कुल: 212
 १ ९ ०६ में प्रकाशित शिव महापुराण की दूसरी पांडुलिपि, १ ९ ६५ में पंडिता पुष्कलाय द्वारा, काशी में सात सौख्य हैं: 

 # संहिता
 (खंड) Adhyāyas
 (अध्याय)
 मैं विद्यावतार सौहित २५
 II रुद्र सौहित:
 मैं।  Sṛśṭikhaṇḍa
 ii।  Satīkhaṇḍa
 iii।  Pārvatīkhaṇḍa
 iv।  Kumārakhaṇḍa
 v। युद्धकथा
 20
 43
 55
 20
 59
 III .तारुद्र सौहित 42
 IV Ko IVirudra Saṁhitā 43
 वी उमा सौख्य 51
 VI कैलाश सौहित 23
 सप्तम वैवाह्य संहिता:
 मैं।  Pūrvabhāga
 ii।  Uttarabhāga
 35
 41
 कुल: 457
 इन पांडुलिपियों को शिव महापुराण  में से एक माना जाता है।

शिव पुराण – Shiv Puran 

Shiv Puran  – शिव का अर्थ है कल्याण। शिव के महात्मय से ओत-प्रोत से यह पुराण शिव महापुराण (Shiv Mahapuran Katha) के नाम से प्रसिद्ध है। 18 पुराणों में कहीं शिव पुराण (Shiv Puran Katha) तो कहीं वायु पुराण का वर्णन आता है। शिव पुराण  का सम्बन्ध शैव मत से है। इस पुराण में प्रमुख रूप से शिव-भक्ति और शिव-महिमा का प्रचार-प्रसार किया गया है। शिव सहज ही प्रसन्न हो जाने वाले एवं मनोवांछित फल देने वाले हैं। किन्तु ‘शिव पुराण’ में शिव के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए उनके रहन-सहन, विवाह और उनके पुत्रों की उत्पत्ति के विषय में विशेष रूप से बताया गया है।

Shiv Puran Katha – शिव पुराण कथा

भगवान नारायण जब जल में शयन कर रहे थे तभी उनकी नाभि से एक सुन्दर एवं विशाल कमल प्रकट हुआ। उस कमल में ब्रह्मा जी उत्पन्न हुये। माया के वश में होने के कारण ब्रह्मा जी अपनी उत्पत्ति के कारण को नहीं जान सके। चारों ओर उन्हें जल ही जल दिखायी पड़ा तब आकाशवाणी हुयी, ‘‘तपस्या करो’’। बारह वर्षों तक तपस्या करने के पश्चात् भगवान विष्णु ने चतुर्भुज रूप में उन्हें दर्शन दिये और कहा मैंनें तुम्हें सत्व गुण से निर्माण किया है लेकिन मायावश ब्रह्मा जी विष्णुजी के स्वरूप को न जानकर उनसे युद्ध करने लगे।

तब दोनों के विवाद को शान्त करने के लिये एक अद्भुत ज्योर्तिलिंग का अर्विभाव हुआ। दोनों बड़े आश्चर्य के साथ इस ज्योर्तिलिंग को देखते रहे और इसका स्वरूप जानने के लिये ब्रह्मा हंस स्वरूप बनाकर ऊपर की ओर और विष्णु वाराह स्वरूप धारण कर नीचे की ओर गये। लेकिन दोनों ही ज्योर्तिलिंग के आदि-अन्त का पता नहीं कर सके।

इस प्रकार 100 वर्ष बीत गये। इसके पश्चात् ज्योर्तिलिंग से उन्हें ओंकार शब्द का नाद सुनायी पड़ा और पँचमुखी एक मुर्ति दिखायी पड़ी। ये ही शिव थे। ब्रह्मा और विष्णु ने उन्हें प्रणाम किया, तब शिव ने कहा, ‘‘कि तुम दोनों मेरे ही अंश से उत्पन्न हुये हो।’’ और ब्रह्मा को सृष्टि की रचना एवं विष्णु को सृष्टि का पालन करने की जिम्मेदारी प्रदान की। शिव पुराण में 24000 श्लोक हैं। इसमें तारकासुर वध, मदन दाह, पार्वती की तपस्या, शिव-पावती विवाह, कार्तिकेय का जन्म, त्रिपुर का वध, केतकी के पुष्प शिव पुजा में निषेद्य, रावण की शिव-भक्ति (Shiv Bhakti) आदि प्रसंग वर्णित हैं।

👉 शिव पुराण में 12 संहितायें 

1. विघ्नेश्वर संहिता 
2. रुद्र संहिता 
3. वैनायक संहिता 
4. भौम संहिता 
5. मात्र संहिता 
6. रूद्रएकादश संहिता
7. कैलाश संहिता 
8. शत् रूद्र संहिता 
9. कोटि रूद्र संहिता 
10. सहस्र कोटि रूद्र संहिता 
11. वायवीय संहिता 
12. धर्म संहिता

विघ्नेश्वर तथा रौद्रं वैनायक मनुत्तमम्। भौमं मात्र पुराणं च रूद्रैकादशं तथा।
कैलाशं शत्रूद्रं च कोटि रूद्राख्यमेव च। सहस्रकोटि रूद्राख्यंवायुवीय ततःपरम्
धर्मसंज्ञं पुराणं चेत्यैवं द्वादशः संहिता। तदैव लक्षणमुदिष्टं शैवं शाखा विभेदतः

इन संहिताओं के श्रवण करने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तथा शिव धाम की प्राप्ति हो जाती है। मनुष्य को चाहिये कि वह भक्ति, ज्ञान, और वैराग्य से सम्पन्न हो बडे आदर से इनका श्रवण करे। बारह  संहिताओं से युक्त यह दिव्य शिवपुराण परब्रह्म परमात्मा (Shiv Mahapuran) के समान विराजमान है और सबसे उत्कृष्ट गति प्रदान करने वाला है।

विघ्नेश्वर संहिता : Vighneshwar Sanhita

इस संहिता में शिवरात्रि व्रत (Shivratri Vrat), पंचकृत्य, ओंकार का महत्त्व, शिवलिंग की पूजा (Shiv Ling Puja) और दान के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है। शिव की भस्म और रुद्राक्ष का महत्त्व भी बताया गया है। रुद्राक्ष जितना छोटा होता है, उतना ही अधिक फलदायक होता है। खंडित रुद्राक्ष, कीड़ों द्वारा खाया हुआ रुद्राक्ष या गोलाई रहित रुद्राक्ष कभी धारण नहीं करना चाहिए। सर्वोत्तम रुद्राक्ष वह है जिसमें स्वयं ही छेद होता है।

सभी वर्ण के मनुष्यों को प्रात:काल की भोर वेला में उठकर सूर्य की ओर मुख करके देवताओं अर्थात् शिव का ध्यान करना चाहिए। अर्जित धन के तीन भाग करके एक भाग धन वृद्धि में, एक भाग उपभोग में और एक भाग धर्म-कर्म में व्यय करना चाहिए। इसके अलावा क्रोध कभी नहीं करना चाहिए और न ही क्रोध उत्पन्न करने वाले वचन बोलने चाहिए।

रुद्र संहिता : Rudra Sanhita

रुद्र संहिता में शिव का जीवन-चरित्र वर्णित है। इसमें नारद मोह की कथा, सती का दक्ष-यज्ञ में देह त्याग, पार्वती विवाह, मदन दहन, कार्तिकेय और गणेश पुत्रों का जन्म, पृथ्वी परिक्रमा की कथा, शंखचूड़ से युद्ध और उसके संहार आदि की कथा का विस्तार से उल्लेख है। शिव पूजा के प्रसंग में कहा गया है कि दूध, दही, मधु, घृत और गन्ने के रस (पंचामृत) से स्नान कराके चम्पक, पाटल, कनेर, मल्लिका तथा कमल के पुष्प चढ़ाएं। फिर धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल अर्पित करें। इससे शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं।

इसी संहिता में ‘सृष्टि खण्ड’ के अन्तर्गत जगत् का आदि कारण शिव को माना गया हैं शिव से ही आद्या शक्ति ‘माया’ का आविर्भाव होता हैं फिर शिव से ही ‘ब्रह्मा’ और ‘विष्णु’ की उत्पत्ति बताई गई है।

शतरुद्र संहिता : Shatrudra Sanhita

इस संहिता में शिव के अन्य चरित्रों-हनुमान, श्वेत मुख और ऋषभदेव का वर्णन है। उन्हें शिव का अवतार कहा गया है। शिव की आठ मूर्तियां भी बताई गई हैं। इन आठ मूर्तियों से भूमि, जल, अग्नि, पवन, अन्तरिक्ष, क्षेत्रज, सूर्य और चन्द्र अधिष्ठित हैं। इस संहिता में शिव के लोकप्रसिद्ध ‘अर्द्धनारीश्वर‘ रूप धारण करने की कथा बताई गई है। यह स्वरूप सृष्टि-विकास में ‘मैथुनी क्रिया’ के योगदान के लिए धरा गया था।

‘शिवपुराण’ की ‘शतरुद्र संहिता’ के द्वितीय अध्याय में भगवान शिव को अष्टमूर्ति कहकर उनके आठ रूपों शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान, महादेव का उल्लेख है। शिव की इन अष्ट मूर्तियों द्वारा पांच महाभूत तत्व, ईशान (सूर्य), महादेव (चंद्र), क्षेत्रज्ञ (जीव) अधिष्ठित हैं। चराचर विश्व को धारण करना (भव), जगत के बाहर भीतर वर्तमान रह स्पन्दित होना (उग्र), आकाशात्मक रूप (भीम), समस्त क्षेत्रों के जीवों का पापनाशक (पशुपति), जगत का प्रकाशक सूर्य (ईशान), धुलोक में भ्रमण कर सबको आह्लाद देना (महादेव) रूप है।

कोटिरुद्र संहिता : Kautirudra Sanhita

कोटिरुद्र संहिता में शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों का वर्णन है। ये ज्योतिर्लिंगों क्रमश: सौराष्ट्र में सोमनाथ, श्रीशैल में मल्लिकार्जुन, उज्जयिनी में महाकालेश्वर, ओंकार में अम्लेश्वर, हिमालय में केदारनाथ, डाकिनी में भीमेश्वर, काशी में विश्वनाथ , गोमती तट पर त्र्यम्बकेश्वर, चिताभूमि में वैद्यनाथ, सेतुबंध में रामेश्वर, दारूक वन में नागेश्वर और शिवालय में घुश्मेश्वर हैं। इसी संहिता में विष्णु द्वारा शिव के सहस्त्र नामों का वर्णन भी है।

साथ ही शिवरात्रि व्रत के माहात्म्य के संदर्भ में व्याघ्र और सत्यवादी मृग परिवार की कथा भी है। भगवान ‘केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग‘ के दर्शन के बाद बद्रीनाथ में भगवान नर-नारायण का दर्शन करने से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे जीवन-मुक्ति भी प्राप्त हो जाती है।

इसी आशय की महिमा को ‘शिवपुराण’ के ‘कोटिरुद्र संहिता’ में भी व्यक्त किया गया है-

तस्यैव रूपं दृष्ट्वा च सर्वपापै: प्रमुच्यते।
जीवन्मक्तो भवेत् सोऽपि यो गतो बदरीबने।।
दृष्ट्वा रूपं नरस्यैव तथा नारायणस्य च।
केदारेश्वरनाम्नश्च मुक्तिभागी न संशय:।

इस संहिता में भगवान शिव के लिए तप, दान और ज्ञान का महत्त्व समझाया गया है। यदि निष्काम कर्म से तप किया जाए तो उसकी महिमा स्वयं ही प्रकट हो जाती है। अज्ञान के नाश से ही सिद्धि प्राप्त होती है।‘शिवपुराण’ का अध्ययन करने से अज्ञान नष्ट हो जाता है। इस संहिता में विभिन्न प्रकार के पापों का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि कौन-से पाप करने से कौन-सा नरक प्राप्त होता है। पाप हो जाने पर प्रायश्चित्त के उपाय आदि भी इसमें बताए गए हैं।

उमा संहिता : Uma Sanhita

‘उमा संहिता‘ में देवी पार्वती के अद्भुत चरित्र तथा उनसे संबंधित लीलाओं का उल्लेख किया गया है। चूंकि पार्वती भगवान शिव के आधे भाग से प्रकट हुई हैं और भगवान शिव का आंशिक स्वरूप हैं, इसीलिए इस संहिता में उमा महिमा का वर्णन कर अप्रत्यक्ष रूप से भगवान शिव के ही अर्द्धनारीश्वर स्वरूप का माहात्म्य प्रस्तुत किया गया है।

कैलास संहिता : Kailash Sanhita

कैलास संहिता में ओंकार के महत्त्व का वर्णन है। इसके अलावा योग का विस्तार से उल्लेख है। इसमें विधिपूर्वक शिवोपासना, नान्दी श्राद्ध और ब्रह्मयज्ञादि की विवेचना भी की गई है। गायत्री जप का महत्त्व तथा वेदों के बाईस महावाक्यों के अर्थ भी समझाए गए हैं।

वायु संहिता : Vayu Sanhita

इस संहिता के पूर्व और उत्तर भाग में पाशुपत विज्ञान, मोक्ष के लिए शिव ज्ञान की प्रधानता, हवन, योग और शिव-ध्यान का महत्त्व समझाया गया है। शिव ही चराचर जगत् के एकमात्र देवता हैं। शिव के ‘निर्गुण’ और ‘सगुण’ रूप का विवेचन करते हुए कहा गया है कि शिव एक ही हैं, जो समस्त प्राणियों पर दया करते हैं। इस कार्य के लिए ही वे सगुण रूप धारण करते हैं। जिस प्रकार ‘अग्नि तत्त्व’ और ‘जल तत्त्व’ को किसी रूप विशेष में रखकर लाया जाता है, उसी प्रकार शिव अपना कल्याणकारी स्वरूप साकार मूर्ति के रूप में प्रकट करके पीड़ित व्यक्ति के सम्मुख आते हैं शिव की महिमा का गान ही इस पुराण का प्रतिपाद्य विषय है।






©️®️
🎯 Writer : Prof.Dr.Vaibhavi Trivedi 
🎯 Matusri Shantaben arts College 



 



👉 Image courtesy : Google 





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